यह गीत मानव जीवन के संघर्ष, समाज की आलोचना, अहंकार, आत्मबोध, गुरु-माँ के महत्व और ईश्वर की अनुभूति को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है। कवि बताता है कि मनुष्य को सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब उसके अपने ही लोग पराये बनकर उसे दोष देते हैं और निंदा करते हैं। समाज बिना समझे आलोचना करता है, जिससे मन दुखी होता है। कवि स्पष्ट करता है कि दुख का कारण किस्मत नहीं, बल्कि अहंकार और असीमित इच्छाएँ हैं। गुरु के सान्निध्य से जीवन को सही दिशा मिलती है और सच्ची अमीरी प्राप्त होती है। ईश्वर हर व्यक्ति के हृदय में निवास करता है, लेकिन मनुष्य उसे बाहर खोजता है। जब कवि अंतर्मन में झाँकता है, तब उसे सच्चे सुख और शांति की अनुभूति होती है। गीत यह भी सिखाता है कि माता-पिता और गुरु द्वारा दिया गया संस्कार, अनुशासन और नैतिक शिक्षा ही मनुष्य को अच्छा नागरिक बनाती है। आलोचना, दुख और संघर्ष जीवन का सत्य हैं, पर इन्हीं से आत्मिक विकास संभव है। आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है , #Tere Apne Paray Bankar Tujhe Tolate Hai, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत=} #तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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की तुझे दुख है की तुझे लोग बहुत कोसते है
तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
बुरा भला कहते है भाव नाही देते
निन्दा की बाजार से वो दर्द दिल को देते
किस्मत बुरी ना दोस्त किस्मत ना छुरी
जिन्दगी की हाल पे जिंदगी जरूरी
मेरे गुरुवर ने मुझको बहुत कुछ दिया है
दिया है अमीरी जीवन तनमन दिया
दुश्मनी ना करता मैं दुश्मन ना हूँ
धरती माँ की आँचल का छोटा सा खिलवना हूँ
की तुझे दुख है की तुझे लोग बहुत कोसते है
तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
बूंद सा जीवन में तूने घमंड को पाला है
ईम्ल की हुनर को तूने अहंकार में बदला है
सुनता है भगवन सबकी देखता बड़ी गौर से
अपनी कहानी को वो देखता न ठौर से
सुनता है सबकी वो सुनाता नहीं
जब सुनाता है तो लोग दिखते नहीं
कोई ना देखा उसको सब ढूंढते है
रहता है दिल में वो बाहर खोजते है
मैं भी ढूंढा था उसको दर दर भटकर
पास में खड़ा था वो तो मुझसे लिपटकर
की तुझे दुख है की तुझे लोग बहुत कोसते है
तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
देखा मैंने उसको जब हृदय की गहराई से
ज़िन्दगी की सारी खुशियां मिल गई परछाई से
मांगा मैं उतना ही जितना मेरी औकात थी
दर्शन को तड़पा था मैं दर्शन की बात थी
खुशियों को देखा मैने बहते करीब से
जरूरत से ज्यादा खुशियां ले गई गम के फितूर में
सामने रोशनी थी पर दिखता न कुछ था
अंधा बनाया था आंधी फितूर था
मन इधर उधर भागे रुक नहीं पाता
बंद आंखों में मुझको नीद नहीं आता
की तुझे दुख है की तुझे लोग बहुत कोसते है
तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
पालन पोषण करने वाला शिक्षा उचित देता जो
नैतिक विकास देता शिष्टाचार भरता वो
हर वो जिम्मेदार है जो जीता समाज में
अच्छे नागरिक की चाहत रखता संसार में
पढ़ाना लिखाना और कौशल देना
समय पर डांट कर देखभाल करना
चित्र चरित्र आचरण अच्छा बनाता जो
सुधारकर अपने को गुणवान बनाता वो
की तुझे दुख है की तुझे लोग बहुत कोसते है
तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
गीत=} #तेरे अपने पराय बनकर तुझे टोकते है
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