गुरु बाहर नहीं, भीतर की चेतना में बसते हैं। विरह भी साधना है, और पीड़ा ही आत्मज्ञान का द्वार बनती है। यह गीत गुरु-वियोग की वेदना और आत्मज्ञान की खोज का मार्मिक चित्रण है। शिष्य कहता है कि गुरु की स्मृतियाँ हृदय में इतनी गहराई से बसी हैं कि उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। बाहरी जुदाई के बावजूद भीतर का संबंध अटूट है। कवि ईश्वरीय विधान पर प्रश्न करता है जैसे कौशल्या, देवकी और यशोधरा को विरह सहना पड़ा, वैसे ही जीवन में त्याग और पीड़ा ज्ञान के मार्ग का हिस्सा हैं। गौतम बुद्ध की तरह सत्य की खोज में मनुष्य को भीतर की गहराई में उतरना पड़ता है। गीत बताती है कि जन्म-मृत्यु का रहस्य गहरा है, समय परिवर्तनशील है, और सच्चा समाधान बाहरी शोर में नहीं बल्कि आत्मचिंतन, मौन और अनुभूति में है। अंततः अंतर्दृष्टि जागृत होने पर मन शान्त होता है और मुक्ति का मार्ग स्पष्ट होता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती, #Rahatee Dilave Ke A Mean Ab Judaee Na Aatee, Writer ✍️ #Halendra Prasad

   

गीत =} #रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती 

 #Rahatee Dilave Ke A Mean Ab Judaee Na Aatee

           Writer ✍️ #Halendra Prasad 

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        गुरुवर कैसी है तेरी यादें अब भुलाई ना जाती

        रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती

         समझ में आता ना मुझे ईश्वर की सब वाणी 

           कौशल्या के पुत्र रानी देवकी के कहानी 

       बुद्ध को देखा जब मैंने आत्मा की गहराई से

       छोड़ गई यशोधरा माता गौतमी को थमाई के

         कैसी विधान गुरुवर किसकी संचालन है

        ममता की प्यार में पुत्र घर से निकलाल है

            पुरुष पुरुषार्थ के नाम बड़ा शोर है

        दिल नहीं देखा कोई दिल का कैसा रोग है

      गुरुवर कैसी है तेरी यादें अब भुलाई ना जाती

      रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती


            जन्म मृत्यु का भेद कोई नहीं जानता 

      समय की परिवर्तन है सब वक्त ही सब जानता

          छिपी हुई बात अंतर मर्म की कहानी है

      सत्य को कहा ना जाता जो मन की प्रिय रानी है

           कैसा समझ लोग का समझे नादानी

      मुस्कानों के पीछे छुपी थी विरह की दीवानी

          शब्दों का शोर था सांसों का जोर था

          दुनियां के दिल का दिलवे ही रोग था

         प्रेम पीड़ा आत्मचिंतन सब मिल आया

        अनकही छुपी थी दिल में कोई ना बताया

       गुरुवर कैसी है तेरी यादें अब भुलाई ना जाती

      रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती


       जीवन का उपहार अंतिम मुझको समझाया

         कोई नहीं स्पष्ट उत्तर क्षमता को बताया

         मन मेरा व्याकुल हुआ इधर उधर जाकर

         खोज में परेशान था वो तह तक जाकर

       इतनी बेचैनी थी कि जान ले सब गहराई को

       ज्ञान की ईच्छा में भटका दिल भी दुहाई हो

         पूछताछ करता था दरबदर भटकता था

     ईच्छा की कमाना में वो मनके अन्दर रहता था

       शोध करता था वो विषयों को खोज कर

       हल नाही मिलता जब तो रो देता बोलकर

     गुरुवर कैसी है तेरी यादें अब भुलाई ना जाती

      रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती


     दिल की चुपकी को कोई समझे ना इस दुनियां में

      अनुभव को माने ना जब मन चले हरमुनिया में

       जिसने स्वीकार किया अनुभव मौन की बातें

       ले गई मुक्ति की ओर अवस्था की सब यादें

         शान्त हुए प्रश्न खोज शान्त लागे दुनियां 

      माया के चक्कर में भटका माया की जमुनिया 

         मानव का महत्त्व अनुभूति ही बताता है

        संवेदना के बोध में एहसास को जगाता है

     अंतर्दृष्टि विकसित होती चीजों को समझाती है

      जागृत अवस्था में दिल चेतना को जगाती है

      गुरुवर कैसी है तेरी यादें अब भुलाई ना जाती

      रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती

गीत =} #रहती दिलवे के अन्दर में अब जुदाई ना आती #Rahatee Dilave Ke A Mean Ab Judaee Na Aatee

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टिप्पणियाँ

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