यह गीत जीवन की क्षणभंगुरता और नश्वरता को केंद्र में रखकर रचा गया है। कवि बताता है कि जीवन, सुख-दुख और सांसारिक प्रेम थोड़े समय के लिए उपस्थित होते हैं, जैसे स्वादिष्ट पकवान जो क्षण भर में समाप्त हो जाता है। मनुष्य की प्रवृत्ति अस्थिर है—वह इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और मंज़िलों के पीछे भटकता रहता है। गीत में यह भी स्पष्ट किया गया है कि शरीर और परिस्थितियाँ नश्वर हैं, लेकिन भावनाएँ और मनोभाव शाश्वत हैं। मन ही प्रेम, घृणा, क्रोध, करुणा, खुशी और पीड़ा को जन्म देता है। जब मन असंतुलित होता है तो चिंता, भय और अशांति पैदा होती है, जिससे व्यक्ति धैर्य खो देता है।कवि यह संकेत देता है कि प्रेम जब आसक्ति और अहंकार में बदल जाता है, तब वह सत्ता, अधिकार और प्रभुत्व की चाह पैदा करता है। अंततः रचना का संदेश यह है कि सच्ची शांति बाहरी प्रेम या भौतिकता में नहीं, बल्कि आत्मबोध, संयम और भावों के संतुलन में है।आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, मौजूद थोड़े समय के लिए प्रेम का पकवान गुरुजी, # Moujud Thode Samay Ke Lie Prem Ka Nuskha Gurujee, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
# Moujud Thode Samay Ke Lie Prem Ka Nuskha Gurujee
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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जीवन क्षणिक क्षभंगुर नश्वर नाशवान गुरुजी
मौजूद थोड़े समय के लिए प्रेम का पकवान गुरुजी
निश्चित है एक दिन ये नाश हो जाएगा
बीतता समय कहता बेकार हो जाएगा
जल्दी आया है जल्दी चला जाएगा
पल भर रुला कर ये स्वर्ग बन जाएगा
क्षणिक है जीवन का सुख थोड़े दिन की बात है
प्रकृति के मिजाज में व्यक्तित्व भी उदास है
आदत स्वभाव से दिखता है दिल
मंजिलों के चक्कर में भटकता मंजिल
अचल अमर ना ये पल पल बदलता
होता ना टिकाऊ ये दरबदर बिखरता
जीवन क्षणिक क्षभंगुर नश्वर नाशवान गुरुजी
मौजूद थोड़े समय के लिए प्रेम का पकवान गुरुजी
भावना शाश्वत है इसकी खत्म ना होता
हर दिन हमेशा रहता पुराना ना होता
बड़ी मजबूत है ठोस है इरादे
अचल है अटल है ये इधर उधर ना भागे
अपनी जगह पे रहता हिलता ना डुलता
दिल है स्थाई इसकी कभी ना मचलता
ख्याल मनोभाव का विचार अजीब ग़जीब है
जज्बा उमंग चाहत इच्छा की अनुभूति है
मन में उत्पन्न करता भाव जगाता
प्रेम घृणा क्रोध खुशी सबको बुलाता
कभी सफल होता है कभी निष्फल
दया भाव जागकर बन जाता विहल
जीवन क्षणिक क्षभंगुर नश्वर नाशवान गुरुजी
मौजूद थोड़े समय के लिए प्रेम का पकवान गुरुजी
दिल से बेचैन होता जब जब घबराता
अशांति की व्यग्र में अधीर हो जाता
पीड़ित करता तन मन को चिन्ता में डालकर
दुख देता आत्मा को जंजीर में बांधकर
बहुती व्याकुल होता जब आतुर हो जाता है
अशांति से घिरकर शांति खो जाता है
चिंतित विचलित होता इधर उधर भागे
भय के कारण से स्थिर ना सा धे
आकुल व्याकुल विह्वल् परेशान हो जाता है
खो देता धैर्य अधीर हो जाता है
कौन समझाए इसे कौन पूछे कारण
सब कुछ उत्पन्न करता भाव का बिरादर
जीवन क्षणिक क्षभंगुर नश्वर नाशवान गुरुजी
मौजूद थोड़े समय के लिए प्रेम का पकवान गुरुजी
अपने ही प्रेम का ये अपने विश्वासी है
अपने अस्तित्व का अपने प्रकाशी है
जीवन की धारा को सौंप देता दया में
बिना शोर मचाए सब खोल देता माया में
आग्रह निवेदन करता प्रभुत्व को जगाता
स्वामित्व को जगाकर हक को बताता
शासन हुकूमत सब प्रभाव को बताता
आंखों के आगे उसके कोई टिक नहीं पाता
राज राज्य हुकूमत सब उसका बसेरा है
बोलबाला श्रेष्ठता का अजबे ये खेल है
असर दबदबा को जब रोब पर चढ़ाता
जोर लगाकर सबको कदमों में झुकता
जीवन क्षणिक क्षभंगुर नश्वर नाशवान गुरुजी
मौजूद थोड़े समय के लिए प्रेम का पकवान गुरुजी
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