माँ के अभाव से मानव हृदय सूना और वीरान महसूस करता है। दुख और वियोग के बीच भी आशा जीवित रहती है, जो हृदय को स्वीकार करने, आत्मिक प्रकाश खोजने और जीवन में पुनः उजाला लाने की प्रेरणा देती है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना, माँ के अभाव में सूना हृदय मौन से हृदय की आत्मिक खोज Adhytmik Darshanik Anmol Rachana, Maa Ke Abhaav Mein Suna Hrday Maun Se Hrday Kee Aatmik Khoj

 माँ के अभाव से मानव हृदय सूना और वीरान महसूस करता है। दुख और वियोग के बीच भी आशा जीवित रहती है, जो हृदय को स्वीकार करने, आत्मिक प्रकाश खोजने और जीवन में पुनः उजाला लाने की प्रेरणा देती है।

आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना, माँ के अभाव में सूना हृदय मौन से हृदय की आत्मिक खोज Adhytmik Darshanik Anmol Rachana, Maa Ke Abhaav Mein Suna Hrday Maun Se Hrday Kee Aatmik Khoj

जब मनुष्य में वियोग शून्यता आंतरिक पीड़ा और माँ के अभाव से उपजे सूनेपन की अभिव्यक्ति और दिल का भवन और मन का निर्जन प्रतीक बनता हैं तो मानव हृदय के अंदर स्नेह सहारा और आवाज़ नहीं बचती ।

जब जीवन से आत्मीय आवाज़ चली जाती है तो मन ऐसा महसूस करता है जैसे कोई उजड़ा हुआ घर है जहाँ न हलचल है न जीवन की चहक है क्योंकि उजड़ा हुआ आसियाना भावनात्मक टूटन है और निर्जन जगह माँ के बिना जीवन का सूना हो जाना है!

जब जीवन में आँखों के सामने यादें प्रकट होती हैं तो आंतरिक संघर्ष उभरकर सामने आता है न कोई स्नेह आता न कोई सहारा मिलता पर यह सत्य है कि आशा और विश्वास केवल प्रतीक बनकर रह जाते हैं क्योंकि हृदय के आधार पे हृदय चलता है जिससे रास्ते के आधार पर सफर होता है!

 मनुष्य का जीवन हृदय से ही संचालित होता है, और जब वही घायल हो जाए, तो जीवन की गति भी थमने लगती है जीवन थम जाती है तो आत्मा भी मौन हो जाती न उसे कुछ चाह होती न कुछ पाने की इच्छा बस वो प्रकृति के साथ चलते रहता है!

 यदि इस जीवन में दुख नहीं केवल सुख होतो मानव खुश न होके केवल दुखी ही रहेगा क्योंकि दुख और अंधकार के बावजूद ही मानव में नम्रता विनम्रता आदर और शालीनता की विकास होती है और यही मानव को चरित्र और संस्कार को दिखाता है।

आज के जीवन में भावनाएँ जीवित हैं पर बंधन में हैं स्वतंत्र होते हुए भी उड़ नहीं पा रहीं है आँखें भरी है दिल नर्म है पर पिंजरे की तोता जैसा जीवन चल रही है कागजों के फूलों में खुशबू ढूंढा जाता है और हकीकत के फूल मुरझा जाते है!

मनुष्य अब जीवन के अंधकार से मुक्ति चाहता है बाहरी प्रकाश नहीं अंतरात्मा का उजाला चाहता है पीड़ा इतनी गहरी है कि अब मानव हृदय की बातें भी सुनाई नहीं देतीं और आध्यात्मिक याचना प्रार्थना करता है कि जितना जल्दी हो सके मुक्ति प्राप्त हो जाए पर मुक्ति भी परीक्षा ले रही है!

यह जीवान की रचना दुख में डूबी होने के बावजूद निराश नहीं है क्योंकि अंत में आशा अभी भी जीवित है जब आशा जीवित हो तो वियोग का करुण गान करता है और टूटे हुए हृदय को स्वीकार करता है और जब स्वीकार कर लेता है तो आत्मिक प्रकाश की खोज में डूब जाता है!

  मानव का हृदय माँ से जुड़ा है और माँ के अभाव या दूरी से जीवन सूना, निर्जन और वीरान प्रतीत होता है। मन में न कोई हलचल है, न स्नेह का सहारा सिर्फ़ मौन, संदेह और उदासी व्याप्त है क्यूंकि गहरे आंतरिक शून्य, पीड़ा और एकांत की अभिव्यक्ति है।

मनुष्य अपने भीतर के भावों को टटोलते हुए बताता है कि आशा, विश्वास और आत्मीयता अब केवल प्रतीक बनते जा रहे हैं। जीवन में अंधकार, निराशा और अज्ञानता फैली हुई है, फिर भी मनुष्य नम्रता, विनम्रता, शालीनता और बिना अहंकार के सबको सम्मान देने की भावना को नहीं छोड़ता। 

हृदय को ही जीवन का आधार मानते हुए मानवीय संवेदनाओं की बात मानव करता है। क्योंकि प्रकाश की कामना है भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर। मनुष्य जीवन के सूनेपन में कोई उजाला आए, कोई सहारा मिले, ताकि मानव हृदय फिर से सुन सके, महसूस कर सके और जीवन में आशा का संचार हो।

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