यह गीत माँ और गुरु के त्यागमय स्वरूप का भावपूर्ण चित्रण है। रचना बताती है कि माँ गुरु स्वयं कष्ट सहकर भी जीवन की वेदनाओं को मुस्कान में ढाल लेते हैं। वे अपनी पीड़ा छुपाकर संसार को संभालते हैं और मौन रहकर मार्गदर्शन करते हैं।गीत में विरह, प्रेम मानसिक थकान मौन की शक्ति और नेतृत्व के अभाव का गहन वर्णन है। सच्चा प्रेम और सच्चा मार्गदर्शन शब्दों से नहीं, अनुभूति से प्रकट होता है। माँ और गुरु जीवन की वह आधारशिला हैं जो बिना कुछ कहे, सब कुछ दे देती हैं।समग्र रूप से यह रचना त्याग करुणा मौन स्नेह और आध्यात्मिक चेतना का गीत है। आध्यात्मिक भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर, #Hansakar Tal Detee Vedana Ko Jeevan Ka Udhaar Guruvaar, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
#Hansakar Tal Detee Vedana Ko Jeevan Ka Udhaar Guruvaar
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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खुद ही छुपकर रोती है दुनियां की मझधार गुरुवर
हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर
भावभूमि है कोमल कोमल आत्मा है
अकथ है स्नेह इसकी मौन सुख मिला है
क्षणिक अनुभूतियों से अनुभव मिला था
गहरी अपराधों को महसूस जो किया था
तन मन की सुख दुख दर्द खुशी बन गई
उत्तेजना ने मारा जब निधन बन छल गई
अजबे प्रक्रिया तन का जानता दिमाग है
छू लेता है मन को जब दिखाता ये आँख है
खुद ही छुपकर रोती है दुनियां की मझधार गुरुवर
हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर
जब कोई बिछड़ता है तो टूट जाती चाहे
मात पिता प्रीतम हो चाहे हो कोई आहे
दुख का तड़प इतना जोरदार होता
भावनाओं के खालीपन से दर्द बढ़ता जाता
मन की बेचैनी गुरुवर हृदय को डाहे
आशु विरह के वेदना अंतर्मन डांटे
पूछ नहीं पाता कुछ भी अपने नायक से
रास्ता दिखाने वाला सो गया है प्यासे
कौन नेतृत्व करेगा कौन आगे चलेगा
कौन होगा मुखिया दिल का कौन अब बोलेगा
खुद ही छुपकर रोती है दुनियां की मझधार गुरुवर
हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर
सेना का सरदार सेनापति मुखिया है
मालिक अधिपत्य है नेतृत्व करता है
शासन करने की शक्ति उसको मिला है
श्रेष्ठ है अवस्था उसकी उत्कृष्ट पद मिला है
चुपचाप रहता है कुछ ना बोलता
मौन की भाषा में वो मौन ही रहता
भाव इतने गहरे है कि बोल की जरूरत ना
भाषा बन कर मौन दिखता आवाज की अपेक्षा ना
सुन्दर मनोहर मनोरम है वाणी
सुखद है आकर्षक ज्ञान की प्याली
खुद ही छुपकर रोती है दुनियां की मझधार गुरुवर
हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर
प्रेम का अनुशासन प्रेम से ना पूछे
भटकता भटकता जग भर में घूमे
कैसा परिवेश है कैसा है ये चित्र
खड़ी है कुएं के पास तरु छाया के बीच
सारी सखियां चली गई घड़े को अब भरकर
ठिठकती है नायिका कुएं पर सिहर कर
घर लौट ना पाती भेद ना बताती
मन की विचलन में वो ना जाने कहां खो जाती
अंतरंग भावों में मन कही खोया था
तन तो वही था गुरुवर भीतर से दिल झोरा था
खुद ही छुपकर रोती है दुनियां की मझधार गुरुवर
हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर
जोर जोर प्रकारे सुन नहीं पाती थी
भावलोक में डूबी है चल नहीं पाती थी
कितनी गहरी रिश्ता है कितनी करीबी
हृदय से जुड़ा है दिल दिल की मजदूरी
मैने सुना है गुरुवर आलस शरीर में ना
मानसिक थकान है सुस्ती प्रेम का हवा है ऐसा
धुंधले भावों में प्रेम अनकहे उमड़ते है
देते है सकते दिलसे बिन कहे झलकते है
नायक का आगमन अनजाने में होता
आते ना सुन पाती नायिका नायक देख लेता
खुद ही छुपकर रोती है दुनियां की मझधार गुरुवर
हंसकर टाल देती वेदना को जीवन का उधार गुरुवर
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