यह गीत जीवन की पीड़ा, आध्यात्मिक खोज और माँ के प्रति अटूट श्रद्धा का भावपूर्ण चित्रण है। कवि संसार की कठोर वास्तविकताओं गरीबी, अकेलापन, दुःख, सामाजिक विषमता और जीवन की अनिश्चितता से व्यथित होकर अपने मन की बात ईश्वर और माँ से इबादत के रूप में कहता है। गीत में दिल का संसार से विरक्त हो जाना, आस्था के सहारे जीवन जीना और कर्म व समय के बदलते स्वरूप पर गहन चिंतन दिखाई देता है। दुःखों के बीच भी माँ की भक्ति, मुस्कान और आशा जीवन को आगे बढ़ाती है। यह रचना सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है, पर श्रद्धा, विश्वास और आत्मचिंतन मनुष्य को संबल देते हैं। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू, #Dilava Ho Gaya Begaana Dil Kee Aadat Se Kahoo, Writer ✍️ #Halendra Prasad

 गीत =} #दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू 

  #Dilava Ho Gaya Begaana Dil Kee Aadat Se Kahoo

           Writer ✍️ #Halendra Prasad 

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            सुन रात की तू बात बड़ी इबादत से कहूं 

        दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू

            निर्धन गरीब का मईया कोई नहीं दिन रे 

            जिन्दगी चलती है जैसे कोई है मशीन रे 

            पूजा आराधना करु फूल जल चढ़ता हूँ 

           देवी देवता को मानकर जिंदगी बिताता हूँ 

             तेरी उपासन में माँ ध्यान को लगाता मैं 

          भगवन का स्तुति करता शिव को बुलाता मैं 

            सुन रात की तू बात बड़ी इबादत से कहूं 

        दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू


              जिन्दगी अधूरी माँ सांसे भी अधूरी है

          प्रेम है जीवन की खेल खेल की मजबूरी है

        भर जाती झोली अब माँ आंसुओं की बाढ़ से

          आग जैसी धधके आँखें ग़म की रिवाज से

        जिसने दिया है जीवन उसका साया मिलता ना

       आता ना नजर में वोतो उसका दया मिलता ना 

           जीवन की कहानी अब तो जीवन से पूछे 

         कौन है तेरा मालिक जीवन जिन्दगी से पूछे 

           सुन रात की तू बात बड़ी इबादत से कहूं 

        दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू


         दिल ने बोला दिल से माता आत्मा से पूछकर 

        दिन भर चमकता सूरज दिल से क्यों जलकर 

          कौन करता है माता ग़मो की खुलासा अब

          दिखते हजारों गम हैं कोई ना उबारा अब

      जीवन की तमाशा पर माँ हँसी अब आ जाती है 

          हंसते है मुस्काके माता गम चली जाती है

           कैसा है जमाना तेरा कैसे कैसे लोग है 

         कोई अंधा कोई कोढ़ी कोई जंगर चोर है

         सुन रात की तू बात बड़ी इबादत से कहूं 

     दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू


           मिट्टी के बदन में माई सांसे भी उधारी है 

          लेने वाला भाड़ा देता देने वाला जुआरी है

       कौन किसको बुरा लगता कौन किसको अच्छा  

      कौन किसकी इच्छा पूछता कौन किसकी दीक्षा 

         इल्जामों की मार से मैं खुद को नहीं बचाऊं 

        किस्मत की खराबी में मैं आग लगाकर आऊ 

        बदल रहा है वक्त यहां पर बदल रहा जमाना 

      पंख लगाकर आया गम खिलुसियों को भरमाया 

          सुन रात की तू बात बड़ी इबादत से कहूं 

      दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू

गीत =} #दिलवा हो गया बेगाना दिल की आदत से काहू 

  #Dilava Ho Gaya Begaana Dil Kee Aadat Se Kahoo

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