अहं का अर्पण और अनुग्रह की यात्रा, Ahan Ka Arpan Aur Anugrah Kee Y

जब मुक्ति की यात्रा आरम्भ होती है, तब अहं (अहंकार) स्वयं अर्पित हो जाता है। मन की सारी वेदनाएँ देवी के चरणों में समर्पित हो जाती हैं, और भक्ति इतनी शुद्ध होती है कि वह पीड़ा को भी पवित्र बना देती है।


एक सच्चे साधक की स्थिति यही होती है कि वह धर्म और भक्ति दोनों को संतुलन में रखता है। न तो प्रेम और जिम्मेदारियों की मर्यादा का अतिक्रमण करता है, और न ही संसार के बंधनों से पलायन करता है। वह संसार में रहते हुए भी उससे बँधा नहीं होता।


जब साधक वस्तुओं व्यवहार परिस्थितियों और लोगों हर स्तर पर ईश्वरीय उपस्थिति को पहचानने लगता है तब उसकी दृष्टि केवल रूप तक सीमित नहीं रहती। वहीं से सगुण से निर्गुण की यात्रा आरम्भ होती है। यह यात्रा साधक के प्रयास से नहीं बल्कि ईश्वर के अनुग्रह से घटित होती है।


जब भक्ति केवल मन तक सीमित न रहकर अवचेतन तक पहुँच जाती है तब जीवन के घाव केवल सहने योग्य ही नहीं रहते उन्हें झेलने की आंतरिक शक्ति भी देवी की कृपा से प्राप्त होती है। और तब चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही अंधकारमय क्यों न हों भीतर उजाले के स्वप्न दिखाई देने लगते हैं।


जब भक्ति ने मन के भीतर के निर्मल, जिज्ञासु और निश्छल बालक को जीवित रखा, तब ईश्वर के प्रति प्रेम भी निष्कपट और सहज बना रहा बिलकुल बचपन जैसा। और जब देवी का दर्शन हुआ, तो उसमें केवल एक रूप नहीं, बल्कि अपना पूरा अस्तित्व, अपना संपूर्ण संसार झलकता दिखाई दिया।


एक साधक कहता है कि हे माँ मैं अपने जीवन की सारी थकान पीड़ा चाहतें और प्रश्न आपके चरणों में समर्पित कर दिए हूँ मुझे एक ही इच्छा थी कि माँ का प्रेम और दर्शन पा सकू पर संसार ने उसे भी हमसे दूर कर दिया फिर भी हमे हर चीज़ में माँ तेरी छवि दिखाई पड़ती है मैं अपने घाव को तेरी कृपा से सह लेता हूँ 


हे माँ जगदम्बा बंधनों में बँधे होने के बावजूद भी मन से तेरे ही पास रहता हूँ और मैं टूट चुका हूँ थक चुका हूँ पर माँ मैं तेरे से शिकायत नहीं करूंगा मेरा दिल बहुत छोटा है तू सब कुछ खुद जानती है माँ तेरे मार्ग का अनुसरण करके तेरे दिए हुए पथ पे आगे चलता हूँ !


जब एक साधक अपने ईष्टदेवी से व्यक्तिगत संवाद है करता है तो

वह अपनी सीमाएँ अपना प्रेम अपनी पीड़ा और अपनी समर्पणभावना सब कुछ उकेरता है और ईष्ट देवी से हृदय की कोमलता कि शिकायत भी नहीं करता केवल अपने आप को समर्पण ही कर पाता है।


 साधक ने अपने जीवन की अधिकांश ऊर्जा अनुभव और भावनाएँ पहले ही खर्च कर दिया है अब माँ से केवल प्रार्थना करता है कि तेरे शरण के सिवा कुछ शेष नहीं है मेरे पास हे 

देवी तेरे आगे मन जैसे कह रहा है अब जीवन में कहने को कुछ नहीं बचा बस जो हूँ जैसा हूँ तेरे चरणों में समर्पित हूँ माँ!


भक्ति का बीज मन में होता है पर सांसारिकता उसे ढँक देती है मनुष्य की स्वाभाविक पीड़ा को ये दुनिया भूलवा देती है तब मनुष्य कहता है कि उसकी केवल एक ही इच्छा है देवी के प्रति प्रेम और भक्ति जो भी चाहत थी सब तेरे प्रति अर्पित कर दिया हूँ 

जीसे हम आत्मसमर्पण की स्थिति कहते है।


जब भक्ति ने भीतर का बालक जीवित रखा तब देवत्व के प्रति प्रेम बचपन सा बना रहा और देवी की झलक में अपना सम्पूर्ण संसार दिखाई देता था और भक्ति ने जब अंतर्मन के बालक को संभाले रखा तब देवत्व से प्रेम निष्कलुष बचपन-सा रहा देवी के एक दर्शन में ही जीवन का पूरा आकाश समा गया।


 भक्ति जब अवचेतन तक पहुँच है तब जीवन के घाव का दर्द झेलने की शक्ति भी देवी की कृपा से मिलती है अंधकार में भी उजाला की सपनों का दर्शन होता है ।


भक्ति जब अवचेतन की गहराइयों में उतरती है तब जीवन के घाव सहने का बल देवी की कृपा से मिलता है अंधकार की गोद में भी

उजाले के स्वप्न दर्शन देने लगते हैं अवचेतन में उतरती भक्ति

घावों को शक्ति बना देती है और अंधकार में भी देवी उजाले के स्वप्न दिखा जाती हैं।


गहरी आध्यात्मिक अनुभूति यह है कि जहाँ साधक वस्तु-व्यवहार परिस्थितियों और लोगों ने हर जगह ईश्वरीय उपस्थिति को पहचानने लगते है तो सगुण से निर्गुण की ओर यात्रा चलने लगती है जिसे अनुग्रह कहते हैं।


गहरी आध्यात्मिक अनुभूति वही हैजहाँ साधक हर वस्तु हर व्यवहार हर परिस्थिति और हर व्यक्ति में ईश्वर की उपस्थिति पहचान लेता है वहीं से सगुण से निर्गुण की यात्रा स्वतः आरम्भ हो जाती है और उसी को अनुग्रह कहते हैं।


जब दृष्टि में भेद मिटता है और हर रूप में वही दिखाई देता है,

तब सगुण का आलिंगन निर्गुण में विलीन हो जाता है

यही अनुग्रह है।


जब मन की व्याकुलता ने जीवन को सवालों में घेर लेता है तब उन सांसारिक सवालों का उत्तर पुस्तकों या ज्ञान में नहीं मिलता न ही केवल बौद्धिक ज्ञान में बल्कि सवालों का उत्तर मिलता है अनुभव में मौन में और ईश्वर के सान्निध्य में।


जब मन की व्याकुलता जीवन को प्रश्नों से घेर लेती है तब उत्तर न शास्त्र देते हैं न शब्दों का ज्ञान उत्तर उतरते हैं अनुभव की गहराई में मौन की शरण में और ईश्वर के सान्निध्य में प्रश्न जब जीवन बन जाएँ तब उत्तर मौन बोलता है अनुभव मेंऔर ईश्वर की उपस्थिति में।

 एक सच्चे साधक की स्थिति है यह है कि धर्म और भक्ति दोनों को संतुलित रखना प्रेम और जिम्मेदारियों की रेखा लांघना भी नहीं और संसार के बंधनों से बाहर निकलना भी नहीं।


सच्चे साधक की अवस्था धर्म और भक्ति का संतुलन।

न प्रेम और कर्तव्य की रेखा लांघना न संसार से मुँह मोड़ लेना।

बंधनों के बीच रहते हुए उनसे परे रहना यही साधना है।

या अधिक सूक्तिपूर्ण शैली में न पलायन न आसक्ति धर्म और भक्ति के बीच साधक का संतुलित पथ ही उसकी सिद्धि है।


पूर्ण आत्म-निवेदन यह है कि मेरे जीवन का स्वामी तू है मैं तेरी कठपुतली नहीं बल्कि तेरे हाथों का खिलौना हूँ जहाँ तेरी इच्छा में ही मेरा खेल मेरा विश्राम और मेरा अर्थ है क्योंकि बंधन नहीं, भरोसा है कठपुतली नहीं तेरे हाथों का खिलौना होना।


साधक यह नहीं कहता कि वह विवश या नियंत्रित है, बल्कि यह स्वीकार करता है कि उसका जीवन ईश्वर की इच्छा में स्वेच्छा से समर्पित है। कठपुतली में बंधन और नियंत्रण का भाव है जबकि हाथों का खिलौना होने में स्नेह विश्वास और आनंद का भाव झलकता है। 


जैसे कोई सबसे प्यारी चीज़ को भी किसी को बताने का साहस नहीं करता वैसे ही अंतर्मन दर्शन तो चाहता है पर साधक उसे भीतर ही संभाल कर रखता है।


जिस प्रकार मनुष्य अपनी सबसे प्यारी वस्तु को भी सबके सामने प्रकट करने का साहस नहीं करता, उसी प्रकार अंतर्मन दर्शन तो चाहता है, पर सच्चा साधक उस अनुभूति को शब्दों में बाँधने के बजाय भीतर ही सहेज कर रखता है।


जैसे सबसे प्रिय वस्तु कहने से डर लगती है वैसे ही अंतर्मन

दर्शन तो चाहता है पर साधक उसे मौन में ही सँभाल कर रखता है और अधिक सूक्तिपूर्ण शैली में जो सबसे अनमोल होता है वह प्रदर्शन नहीं चाहता साधक का दर्शन भीतर ही सुरक्षित रहता है।


जब मुक्ति की शुरुआत होती है तो अह भी अर्पण हो जाता और मन की वेदनाएँ भी देवी की ओर चली जाती और भक्ति आपकी पीड़ा को भी पवित्र कर देता है।


जब मुक्ति का उदय होता है अहं स्वतः अर्पित हो जाता है मन की समस्त वेदनाएँ देवी में विलीन हो जाती हैं और भक्ति दुःख को भी प्रसाद बना देती है सरल आधुनिक भाषा में मुक्ति की शुरुआत में इंसान अपना अहं छोड़ देता है मन का दर्द ईश्वर को सौंप दिया जाता है और भक्ति उस दर्द को भी शुद्ध कर देती है।


भक्ति निष्कपट प्रेम है जीवन की थकान का स्वीकार है

साधक की कोमलता का प्रतिबिंब है देवी से किया मौन संवाद है

और आत्मसमर्पण की चरम अवस्था है मैं अब कुछ नहीं कहूँगा तू ही सब जानती है मेरा हृदय सीमित है पर प्रेम असीम है मैं तेरे चरणों में हूँ बस यहीं मेरा अंत और आरंभ है।


भक्ति का बीज मन के भीतर ही जन्म लेता है परन्तु सांसारिकता की धूल उसे ढँक देती है जीवन की स्वाभाविक पीड़ा और भीतर की प्यास को यह दुनिया क्षणभर को भुला तो देती है पर साधक का हृदय उसे कभी नहीं भूलता।


जब मनुष्य हर दिशा में भटककर थक जाता है तब उसे एक ही सत्य समझ आता है उसकी एकमात्र और अंतिम इच्छा देवी के प्रति प्रेम और अनन्य भक्ति है जो भी चाहतें थीं जो भी आकांक्षाएँ थीं सब वह माँ के चरणों में समर्पित कर देता है इसी अवस्था को पूर्ण आत्मसमर्पण कहते हैं जहाँ मैं समाप्त हो जाता है और केवल उनकी इच्छा ही साधक की दिशा बन जाती है।


जीवन की सारी थकान पीड़ा चाहतें और प्रश्न आपके चरणों में समर्पित कर दिए हूँ मैं मेरी एक ही इच्छा थी माँ का प्रेम और दर्शन पर संसार ने उसे भी हमसे दूर कर दिया फिर भी हमे हर चीज़ में माँ तेरी छवि दिखाई पड़ती है मैं अपने घाव को तेरी कृपा से सह लेता हूँ और बंधनों में बँधे होने के बावजूद भी मन से उनके ही पास रहता हूँ और मैं टूट चुका हूँ थक चुका हूँ पर माँ मैं शिकायत नहीं करूंगा मेरा दिल छोटा है तू सब कुछ माँ खुद जानती है।

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