यह रचना अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन करती है कि जीव, आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। जैसे लहरें महासागर में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती हैं वैसे ही सभी जीव अंततः ब्रह्म में लीन होते हैं। यह भेद केवल अज्ञान के कारण प्रतीत होता है। इस सत्य की अनुभूति से अहंकार भय और द्वेष नष्ट होकर प्रेम करुणा और समभाव का उदय होता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण अमूल्य रचना हम दो नहीं केवल एक अद्वैत चेतना का दर्शन, Adhytmik deishti Amuly Rachana Ham Do Nahin Keval Ek Advait Chetana,

 

आध्यात्मिक दृष्टिकोण अमूल्य रचना हम दो नहीं केवल एक अद्वैत चेतना का दर्शन,  Adhytmik deishti Amuly Rachana Ham Do Nahin Keval Ek Advait Chetana Ka Darshan,

जैसे संसार के सभी जीव अंततः ब्रह्म रूपी अनंत सत्ता में विलीन हो जाते हैं वैसे ही छोटी-छोटी लहरें शिशुओं की भाँति विशाल महासागर में जाकर मिल जाती हैं। लहर अलग दिखाई देती है, पर उसका अस्तित्व सदा समुद्र ही होता है। इसी प्रकार जीव और ब्रह्म का जो भेद हमें प्रतीत होता है वह अज्ञान और अविद्या का परिणाम है।

जैसे नदी का जल अलग-अलग नाम और रूप धारण कर बहता है पर अंत में सागर में मिलकर अपना पृथक अस्तित्व खो देता है, वैसे ही सभी जीव आत्मा के स्तर पर पहले से ही ब्रह्म हैं। मृत्यु या मोक्ष कोई नई उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान है यही परम सत्य है।

इस सृष्टि में न जीव अलग है न ब्रह्म न आत्मा अलग है न परमात्मा। सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही चेतना व्याप्त है जो हमारे भीतर है वही दूसरे के भीतर भी है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही नियम एक ही चेतना और एक ही सत्य से आबद्ध है।

कोई भी अस्तित्व पृथक नहीं है। जब यह अनुभूति जाग्रत होती है तब द्वेष अहंकार और भय का क्षय हो जाता है तथा करुणा प्रेम और समभाव स्वत प्रकट हो जाते हैं। मैं और तू का भेद मिटकर सब मैं ही हूँ की अनुभूति होती है जहाँ दो नहीं केवल एक ही रह जाता है।

हम दो नहीं केवल एक हैं यह संदेश हमें स्मरण कराता है कि हम अलग-अलग प्राणी नहीं बल्कि एक ही अनंत चेतना की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं जो भिन्न-भिन्न रूपों में सम्पूर्ण सृष्टि में प्रवाहित हो रही हैं।

नदियाँ हँसती हैं खेलती हैं ममता लुटाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड भी हो जाती हैं। उनकी सारी लहरें अंततः अनंत महासिंधु में एक हो जाती हैं। नदी के माध्यम से प्रकृति की बाल-सुलभ चंचलता माँ की ममता सृष्टि के नियम उदय-विकास क्रीड़ा और अंत में विलय ये सभी जीवन के दार्शनिक सत्य को प्रकट करते हैं।

गंगा सिंधु और शिशु के रूपकों के माध्यम से प्रकृति की करुण ममतामयी और जीवनदायिनी लीला व्यक्त होती है। नदी मानो मानवीय रूप धारण कर हँसती है अट्टहास करती है हिलोरे लेती है और तटों पर स्वर्णिम आभा बिखेरकर प्रकृति की प्रसन्नता का सजीव बिंब रचती है।

जैसे माँ पालना झुलाते हुए लोरी गाती है वैसे ही छोटी-छोटी लहरें मधुर ध्वनियाँ उत्पन्न करती हैं। नदियों की लघु लहरें शिशु-सी मुस्कान से भरकर मानो आपस में खेलती प्रतीत होती हैं और एक सहज प्राकृतिक बाल-लीला का दृश्य उपस्थित करती हैं।

पर जब नदियों की बड़ी लहरें उग्र होकर आगे बढ़ती हैं, तो वे भयावह भी लगती हैं। जितनी सुंदर वे प्रतीत होती हैं, उतनी ही विनाशकारी शक्ति भी अपने भीतर समेटे होती हैं। यही नदी का गंभीर और प्रचंड रूप है जो सृष्टि के संतुलन का प्रतीक है।

जैसे जैसे सभी जीव अन्त में ब्रह्म अनन्त सत्ता में विलीन हो जाते हैं वैसे ही छोटी-छोटी लहरियाँ शिशु-गण की भांति विशाल महासिन्धु में जाकर मिल जाती हैं जिस प्रकार संसार के सभी जीव अंततः ब्रह्म रूपी अनंत सत्ता में लीन हो जाते हैं उसी प्रकार छोटी-छोटी लहरें भी शिशुओं की तरह विशाल महासागर में जाकर अपना अलग अस्तित्व खो देती हैं। लहर अलग दिखाई देता है पर उसका अस्तित्व सदा समुद्र होता है!

  जीव जगत और ईश्वर का जो भेद हमें दिखाई देता है वह अज्ञान अविद्या के कारण दिखाई देता है। जैसे नदी का जल अलग-अलग नाम और रूप लेकर बहता है और अंत में सागर में मिलकर अपना पृथक अस्तित्व खो देता है वैसे ही सभी जीव आत्मा के स्तर पर पहले से ही ब्रह्म हैं क्योंकि मृत्यु मोक्ष कोई नई प्राप्ति नहीं है बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान है परम सत्य है।

 इस सृष्टि में न जीव अलग है न ब्रह्म अलग हैं न आत्मा न परमात्मा समस्त सृष्टि में वही एक चेतना व्याप्त है जो हमारे भीतर है वही दूसरे के भीतर भी है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही नियम एक ही चेतना और एक ही सत्य से जुड़ा हुआ है 

कोई भी अस्तित्व अलग-थलग नहीं है क्योंकि जब अनुभूति जाग्रत होती है तब द्वेष अहंकार और भय का क्षय होता है और करुणा प्रेम और समभाव का स्वाभाविक रूप से प्रकट होता हैं तथा मैं और तू का भेद मिटकर सब मैं ही हूँ की अनुभूति होती है जिसे दो नहीं केवल एक कहा जाता है!

हम दो नहीं केवल एक है यह संदेश हमें यह स्मरण कराता है कि हम अलग-अलग प्राणी नहीं है बल्कि एक ही अनन्त चेतना की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं जो विभिन्न रूप स्वरूप जीव के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि में प्रविष्ट है!

नदीया हँसती है खेलती है ममता देती है और साथ ही प्रचंड भी है नदियों की सारी लहरें अनन्त महासिंधु में जाकर एक हो जाती हैं क्योंकि नदी के माध्यम से प्रकृति की बाल-सुलभ चंचलता माँ की ममता और सृष्टि के अनन्त नियम उदय विकास खेल और अनन्त में विलय हो जाना सब नदियां अपने सुंदर चित्रों को प्रकट करती है और यही जीवन का दार्शनिक सत्य भी है।

 जैसे गंगा नदी सिन्धु और शिशु के रूपक के माध्यम से प्रकृति की करुण ममतामयी और जीवनदायी लीला को प्रकट करती हैं उसी प्रकार नदी को मानवीय रूप देकर नदी हँसती हुई अट्टहास हिलोरे लेती है और तट पर सुनहरी चमक पीत-प्रभा के साथ मुस्कान-सी बिखेर कर प्रकृति की प्रसन्नता का बिम्ब दिखाती है।

जैसे माँ पालने को हिलाते हुए लोरी गाती है वैसे ही छोटी-छोटी लहरें भी निरर्थक-सी लगने वाली गंगा मधुर गाकर ध्वनियाँ उत्पन्न करती हैं जो नदियों को मातृ-स्वरूप दिखाती है।

नदियों की छोटी छोटी लहरें शिशु समान छोटी छोटी मुस्कान भरकर मानो जैसे आपस में मिलकर खेल रही हों एक प्राकृतिक सहज बाल-लीला का दृश्य प्रदर्शित करती है जिसे देखकर मन प्रसन्न हो जाता है!

नदियों की बड़ी लहरें जब आगे बढ़ती हैं तो वे मृत्यु जैसे भयावह व्यापार में लगी प्रतीत होती हैं क्योंकि जितना सुन्दर लगती है उतना ही भयावह रूप भी धारण करती है और उनकी शक्ति विनाश भी कर सकती है तथा उस नदीयो का गंभीर प्रचंड रूप झलकता है।

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