यह रचना बताती है कि आँसू दुर्बलता नहीं, बल्कि करुणा, प्रेम और आत्मबोध का चिन्ह हैं। कोमल व संवेदनशील हृदय ही ईश्वर के दिव्य सत्य को ग्रहण कर सकता है, क्योंकि अहंकार और भय उस उज्ज्वल ज्योति से दूर रखते हैं। शिशु की निष्कपट प्रसन्नता और रंगों से आनंद लेना जीवन की सरलता का प्रतीक है। जीवन का सच्चा आनंद कठोरता में नहीं, बल्कि कोमलता, सरलता और प्रेम में निहित है।आध्यात्मिक-दार्शनिक दृष्टिकोण से एक अमूल्य रचना कोमल हृदय की दिव्य यात्रा में मौन का उजाला, Aadhyaatmik-Daarshanik Drshtikon Se Ek Anamol Rachana Komal Hrday Kee Divy Yaatra Mein Maun Ka Ujaala,
आध्यात्मिक-दार्शनिक दृष्टिकोण से एक अमूल्य रचना कोमल हृदय की दिव्य यात्रा में मौन का उजाला Aadhyaatmik-Daarshanik Drshtikon Se Ek Anamol Rachana Komal Hrday Kee Divy Yaatra Mein Maun Ka Ujaala
आँसू केवल दुःख के नहीं हैं बल्कि आँसू करुणा प्रेम आत्मबोध और अहंकार के गलने का आंसू है क्योंकि हृदय इतना जीवंत है कि वह दूसरों का दर्द अपना समझकर पिघल जाता है संवेदनशील हो जाता है और आंखों से आंसू बहने लगते है!
संवेदनशीलता का अर्थ है छोटी-सी बात से प्रभावित हो जाना प्रेम, पीड़ा और सौंदर्य को गहराई से महसूस करना ऐसा मन कठोर नहीं होता, बल्कि दूसरों की भावनाओं के प्रति खुला रहता है। क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग एक प्रकार की गंभीरता भी है यहाँ श्यामलता का अर्थ अंधकार या नकारात्मकता नहीं है।बल्कि गहराई मौन का रहस्यात्मकता का प्रतीक है!
जीवन के दुःख-सत्य को स्वीकार करने की परिपक्वता का जैसे गहरी नदी ऊपर से शांत और गहरी दिखती है, वैसे ही यह हृदय ऊपरी चंचलता के भीतर गंभीर अनुभवों से भरा हुआ है।
यह हृदय रो सकता है इसलिए मानवीय है महसूस कर सकता है इसलिए जीवित है और जीवन के गूढ़ सत्य को समझता है इसलिए गंभीर है कारण ऐसा है कि हृदय निश्चल शुद्ध और दिव्य प्रेम का अधिकारी बनता है।
यह हृदय अत्यंत कोमल चंचल भावुक और करुणा से भरा हुआ है। इसमें आँसू हैं संवेदनशीलता है और एक प्रकार की गंभीरता भी है जो श्यामा रंग से उभरता है और जीवन को एक मार्ग देता है जिससे मानवीय हृदय को मुक्ति मिलती है।
मै कहता हूँ कि हे पावन ईश्वर हे परम सत्य के दिव्य सत्ता आपकी कोमलता विनम्रता और भावुकता के कारण यह हृदय निश्चल प्रेम स्थिर सच्चा और शुद्ध प्रेम को प्राप्त कर सका है जिसे सच्चा प्रेम कठोरता से नहीं, बल्कि कोमल हृदय से मिलता है।
जब कोई ईश्वर की दिव्य ज्योति की बात करता है तो अत्यंत उज्ज्वल पवित्र और तेजस्वी से बताता है कि जो प्रखर है वह सामान्य मनुष्य को भयकारी प्रतीत होने लगता है क्योंकि
कारण यह है कि मनुष्य उस दिव्य प्रकाश को सीधे सहन नहीं कर पाता और अपने दुख अज्ञान पीड़ा और सांसारिक माया की छाया में उसे ढक लेता है दुख मानो एक आवरण बन जाता है, जिससे वह उस दिव्य सत्य से आँखें चुरा लेता है।
कोमल भावुक और विनम्र हृदय ही सच्चे प्रेम को प्राप्त करता है। ईश्वर का सत्य अत्यंत उज्ज्वल है परंतु उसकी तीव्रता से डरकर मनुष्य अपने दुखों और सीमाओं की आड़ में उससे दूर हो जाता है क्योंकि जब तक अहंकार और भय है तब तक उस ज्योति का साक्षात्कार संभव नहीं।
जब एक पिता पालक के रूप में अपने शिशु से संवाद है तो शिशु की मासूम प्रसन्नता और रंगीन खिलौनों के प्रति आकर्षण को देखकर उसके जीवन और सृजन के गहरे अर्थ समझ में आने लगते हैं।
जब कोई पिता जब अपने शिशु के लिए रंग-बिरंगे खिलौने लाता है और शिशु उन्हें देखकर अत्यंत आनंदित हो उठता है तब पिता को यह अनुभूति होती है कि रंगों का खेल आखिर क्यों इतना आकर्षक होता हैक्योंकि रंगों के घन का अर्थ केवल खिलौनों के रंग नहीं हैं बल्कि यह जीवन की विविधता सौंदर्य और सृजनशीलता का प्रतीक है।
यही सत्य है कि शिशु बिना किसी तर्क के रंगों से आनंद लेता है। और उसी क्षण पिता को यह बोध होता है कि निष्कपट आनंद ही जीवन का मूल है जैसे शिशु रंगों में रम जाता है और वैसे ही इस जीवन मे मनुष्य को भी जीवन के रंगों में खो जाना चाहिए जिसमें जटिलता न हो
मनुष्य को इस जीवन को शिशु की आँखों से देखना सीखना चाहिए क्योंकि जहाँ रंग खेल और आनंद ही सबसे बड़ा सत्य है वही जीवन का वास्तविक रंग छुपा है हम कुछ लेकर आए है न कुछ लेकर जायेंगे!
जब मैं अपने छोटे बच्चे के लिए रंग-बिरंगे खिलौने लाता हूँ,तो उसे बहुत खुशी होती है। उसकी इस मासूम खुशी को देखकर मुझे समझ में आता है कि रंगों का खेल इतना सुंदर और आनंद देने वाला क्यों होता है अर्थात बच्चे की सरल और निष्कपट प्रसन्नता से मुझको यह बोध होता है की जीवन का सच्चा आनंद सरलता रंगों और खेल में ही छिपा है।
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