जीवन में शांति संघर्ष के बाद ही मिलती है। भोलापन नहीं, बल्कि जागरूकता और विवेक आवश्यक हैं क्योंकि विपत्तियाँ छिपकर आती हैं। मनुष्य का बाहरी व्यवहार उसके आंतरिक स्वभाव को प्रकट करता है। अनुशासन, अनुभव और आत्मबोध से ही सही निर्णय और सच्ची विजय संभव है। संघर्ष से शांति तक : जागरूकता, अनुशासन और आत्मबोध का मार्ग, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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जीवन का मार्ग कंकरीला कठिनाइयों, संघर्षों और दुखों से भरा हुआ हो सकता है लेकिन इन कठिन रास्तों को पार करने के बाद ही वह स्थान आता है जहाँ मन को शांति मिलती है आत्मा स्थिर होती है संघर्ष समाप्त होकर वरदान मिलता है अर्थात जीवन के काँटेदार मार्ग का अंतिम छोर शांति का राज्य है जो धैर्य और परिश्रम से वहाँ पहुँचता है वही सच्ची विजय प्राप्त करता है।
सावधान रहो जागरूक बनो वरना कभी-कभी अपने ही लोग छल कर सकते हैं क्योंकि शत्रु विपत्ति छिपी हुई प्रतीक्षा कर रही है, बिना बताए आक्रमण कर सकती है।
जीवन में केवल भोलापन पर्याप्त नहीं जागरूकता, विवेक और सावधानी आवश्यक है कभी-कभी संकट सामने नहीं दिखता, परंतु छिपा होता है यही केवल चेतावनी सुझाव नहीं बल्कि अध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार की चेतावनी है
समय से पहले जाग जाओ नहीं तो हानि हो सकती है।
जीवन के कठिन मार्ग के अंत में ही शांति का साम्राज्य छिपा है।
जीवन में जागरूकता आवश्यक है क्योंकि विपत्ति हमेशा सामने नहीं दिखती न बताकर आती जब भी आता तूफान की तरह आती है और भीतर से हिलाकर चली जाती।
संवेदनशील और अनुभवी लोग अकसर ही आक्रामक क्रूरतापूर्ण व्यक्ति को पहचान लेते है घटना दुर्घटना कारित करने से पहले ही उसके अभद्र व्यवहार को चाल चलन से जान लेते है जो व्यक्तित्व विश्लेषण कहलाता है।
मनुष्य के बाहरी व्यवहार के माध्यम से मनुष्य के आंतरिक स्वभाव को समझा जा सकता है जैसे यदि कोई व्यक्ति कठिन परस्थितियों में भी शान्त रहता है तो उसके व्यक्तित्व गुण नियंत्रित अनुशासित व्यवस्थित और तपस्वी माना जाता है क्योंकि नियंत्रित वही होता है जो नियंत्रण में हो!
अनुशासित वहीं है जो नियमों को सुचारू रूप से पालन करे जैसे अनुशासित जीवन जिस व्यक्ति का मन वाणी विचार और कर्म उसके नियंत्रण में उसी को अनुशासित जीवन कहा जा सकता है क्योंकि अनुशासित जीवन वह जीवन है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों समय व्यवहार और कर्मों को नियम संयम और उद्देश्य के अनुसार संचालित करता है।
अनुशासित जीवन की विशेषता यह है कि वह समय का सदुपयोग कराता है, न कि दुरुपयोग। यह व्यक्ति को अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार बनाता है, न कि गैर-जिम्मेदार। अनुशासन आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण सिखाता है तथा कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहने की प्रेरणा देता है। यह लोलुपता को नियंत्रित कर मर्यादित आचरण अपनाने की शिक्षा देता है, न कि अमर्यादित व्यवहार को बढ़ावा देता है अनुशासित जीवन नियमित दिनचर्या के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता है और जागरूक जीवन जीना सिखाता है, न कि अनियमित जीवनशैली। यह व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान बनाता है और उसे प्रतिबद्ध रहना सिखाता है।
संवेदनशील और अनुभवी लोग अक्सर किसी आक्रामक, क्रूर या असामाजिक व्यक्ति को किसी घटना या दुर्घटना के घटित होने से पहले ही पहचान लेते हैं क्योंकि आक्रामक, क्रूर या असामाजिक व्यक्ति
व्यक्ति का बाहरी व्यवहार और शारीरिक भाषा उसके मनोभाव, इरादों और संभावित जोखिमपूर्ण प्रवृत्तियों को समझने में मदद करती है।
किसी व्यक्ति का बाहरी व्यवहार जैसे उसका बोलने-चालने का तरीका, चाल-ढाल, शारीरिक भाषा और भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ अक्सर उसके नियमों के प्रति असम्मान और अभद्र आचरण के संकेत देता है। ये संकेत उसके मानसिक और व्यवहारिक प्रक्रियाओं को व्यक्त करते हैं। व्यक्ति के व्यवहारिक पैटर्न और शारीरिक गतिविधियों के आधार पर उसके संभावित इरादों तथा जोखिमपूर्ण प्रवृत्तियों का अनुमान लगाया जा सकता है। उसके हाव-भाव और क्रियाएँ ही उसके आंतरिक भावों और प्रवृत्तियों को प्रकट करती हैं।
घटना होने से पहले चेतावनी के संकेत पहचान लेना ही पूर्वानुमान कहलाता है क्योंकि जहां क्षमता अक्सर उच्च संवेदनशीलता अनुभव मनोवैज्ञानिक समझ और सामाजिक व्यवहार के सूक्ष्म अवलोकन से विकसित सिद्धांतों पर काम करती है वहां सब सुचारू रूप से संचालित होते है!
पूर्वानुमान केवल अनुमान नहीं होता बल्कि वह सिद्धांत होता है जो अनुभव संवेदनशीलता मनोवैज्ञानिक व सामाजिक समझ का परिणाम को जानने और पहचानने में व्यवस्थाओं को मदद करता है और यही पूर्वानुमान का समय रहते सही निर्णय लेने में मदद करता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण वह तरीका है जिससे हम मानव सोच, भावना और व्यवहार को समझने व विश्लेषित करने की कोशिश करते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के उद्देश्य से यह जानना होता है कि कोई व्यक्ति क्या सोच रहा है और क्यों सोच रहा है तथा उसी के अनुसार वो व्यवहार कर रहा है।
मनुष्य के बाहरी व्यवहार को समझने के लिए आंतरिक मनःस्थिति को समझना ज़रूरी है क्योंकि हर व्यवहार के पीछे कोई न कोई मानसिक प्रक्रिया होती है चाहे व्यक्ति का अनुभव हो भावनाएँ हो या फिर विश्वास और वातावरण उसके निर्णयों को प्रभावित करते हैं!
मनुष्य के मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने के लिए मनुष्य के सोच को मनुष्य के परस्थितियों के साथ जोड़कर देखा जाता है क्योंकि मनुष्य की भावनाएं डर, खुशी, क्रोध, तनाव जैसी भावनाएँ परस्थितियों के साथ अपने निर्णयों को कैसे प्रभावित करता हैं।
पहले की घटनाओं में मनुष्य वर्तमान व्यवहार को अपने अनुभव से कैसे आकर देता है और व्यक्ति क्या चाहता है और किस कारण से कार्य कर रहा है और सामाजिक परिवेश परिवार समाज और संस्कृतिक पर उसका प्रभाव कैसा है और उसकी भावनात्मक और आध्यात्मिक संदेशवाहक सामाजिक दृष्टिकोण से क्या चाहत रखता है!
यदि कोई व्यक्ति बार बार जोखिम लेने से बचता है तो मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से हम आकलन करते है कि क्या उसे पहले नकारात्मक अनुभव हुआ है? या फिर उसमें असफलता का डर है? या उसका आत्मविश्वास कम है? पर है तो क्यों है व्यवहार को गहराई से समझने में मदद मिलता है संघर्ष और समस्याओं का समाधान खोजने में सहायता मिलता है और बेहतर संवाद, निर्णय और पूर्वानुमान संभव बनाता है।
जब व्यक्ति अनजाने में वही व्यवहार दोहराता है जिससे उसे पहले सुरक्षा या सफलता मिली हो जिसे मनोविज्ञान में सीखी हुई प्रतिक्रिया कहा जाता है क्योंकि सकारात्मक अनुभव आत्मविश्वास, साहस, आशावाद को जन्म देता है और
नकारात्मक अनुभव सावधानी, भय, संकोच को जन्म देता है जिस व्यक्ति को पहले विश्वासघात से संवारा गया है वो व्यक्ति भविष्य में संबंधों में सतर्क रहता है और पूर्व अनुभव से वर्तमान व्यवहार को आकार देता है!
इस सृष्टि में मनुष्य वही कार्य करना चाहता है जिस कार्य से उस व्यक्ति को अर्थ संतुलन और संतोष आदर सम्मान मिलने की आशा रहती है क्योंकि व्यक्ति की इच्छा और कर्म के पीछे मुख्य तीन स्तर की कामना छुपी होती है मूल आवश्यकताएँ सुरक्षा सम्मान पहचान अपनापन आंतरिक प्रेरणा आत्मसंतोष उद्देश्य की खोज आत्मविकास और बाहरी प्रेरणा सामाजिक स्वीकृति सफलता पद प्रशंसा जिससे व्यक्ति अपने आपको गौरवान्वित महसूस करने में जीता है!
समान परिस्थिति में भी अलग-अलग संस्कृति के लोग अलग व्यवहार करते हैं क्योंकि मनुष्य अकेले नहीं बनता है मनुष्य वह संस्कारों से निर्मित होता है जो सामाजिक परिवेश परिवार और संस्कृति के सुक्ष्म प्रभावो से निर्मित होता है !
व्यक्ति परिवार के मूल्य विश्वास भावनात्मक ढाँचा संवाद करने का तरीका भय या साहस की जड़ें समाज स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता पहले नैतिकता और नियम तुलना और प्रतिस्पर्धा तथा संस्कृति सोच की दिशा आध्यात्मिकता परंपरा जीवन-दृष्टि से बंध कर जीवन और अपने भीतरी आत्मा को न देख पाता न संवाद कर पाता और कभी कभी इस भूल भुलैया में भुलाकर अपने आप से ही मौन हो जाता है!
जब कोई व्यक्ति किसी समाज से जुड़ता है तो वह चाहता है कि उसकी भावनाएँ स्वीकार हों और उसका उद्देश्य समझा जाए मनुष्य केवल तर्क से नहीं बल्कि भावना और चेतना से भी संचालित होता है भावनात्मक और आध्यात्मिक संदेशवाहक की भूमिका कहा जाता है!
मनुष्य का भावनात्मक संदेश अपनापन चाहता है
समझा जाना चाहता है सम्मान और करुणा की अपेक्षा रखता है
और आध्यात्मिक संदेश जीवन का अर्थ खोजने की चाह में भी
आत्मशांति और अपने अस्तित्व का उद्देश्य चाहता है क्यों कि बिना उद्देश्य के कोई भी जीवन सम्भव नहीं समझा जाता यदि जीवन मिला है तो उद्देश्य की जरूरत भी आवश्यक है!
मनुष्य का अनुभव इच्छा सामाजिक संस्कार भावनात्मक ज़रूरतें आध्यात्मिक खोज मनुष्य का वर्तमान व्यवहार का एक संगम है जो समझने से न केवल व्यक्ति को, बल्कि समाज की दिशा को भी बेहतर समझा जा सकता है क्योंकि ये सभी तत्व मिलकर व्यक्ति के व्यवहार, निर्णय और प्रतिक्रिया का मार्ग तय करते हैं।
मनुष्य का अनुभव पूर्व की घटनाओं, सीख और परिणाम है इच्छा व्यक्ति की मूल आवश्यकताएँ आंतरिक प्रेरणा और बाहरी प्रेरणा है सामाजिक संस्कार परिवार समाज और संस्कृति से बने मूल्य और नियम है भावनात्मक ज़रूरतें अपनापन समझा जाना सम्मान और करुणा है और आध्यात्मिक खोज जीवन का अर्थ आत्मशांति और अस्तित्व का उद्देश्य है।
जब मनुष्य का दिमाग सीख लेता है कि जोखिम एक खतरा है तो बार-बार जोखिम से बचने का व्यवहार बनाता है क्योंकि यदी व्यक्ति को पहले असफलता अपमान हानि आलोचना का अनुभव हुआ है तो मस्तिष्क सुरक्षा-तंत्र विकसित कर लेता है जोखिम खतरा से बचने का संकेत भेज सुरक्षित रहने सुरक्षा-तंत्र विकसित कर लेता है!
संघर्ष से शांति तक : जागरूकता, अनुशासन और आत्मबोध का मार्ग, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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