यह गीत प्रकृति, जीवन और चेतना के गहरे संबंध को दर्शाता है। इसमें सूर्य के माध्यम से समय के तीन रूप सुबह की शीतलता, दोपहर की तपन और शाम की शांति के साथ जीवन की कठोर सच्चाइयों को उकेरा गया है। जल के अभाव में सृष्टि की पीड़ा, धरती की व्यथा और मानव के भीतर के दुःख-सहनशीलता को संवेदनशीलता से व्यक्त किया गया है। यह गीत संदेश देता है कि करुणा, दया, धैर्य और प्रेम ही जीवन को संजीवनी देते हैं। अंततः भक्ति, आत्मचिंतन और प्रकृति के संतुलन से ही सुख-शांति संभव है। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, पता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता, Tapata Teevr Jvaala Mein Dopahar Hote Hee Bekaar Ho Jaata, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

 

गीत =} #तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता 

#Tapata Teevr Jvaala Mein Dopahar Hote Hee Bekaar Ho Jaata 

           Writer ✍️ #Halendra Prasad 

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  सूरज शाम को शीतल सुबह सुबह में गुलजार हो जाता 

     तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता

            काँपता आकाश ताप से कांपती सब सृष्टि 

              सांस प्रवास कांपता कांपती है धरती 

           अन्दर जो जाती है सांसे दिल को दुखाती है

          दुख की पीड़ा से भरकर बाहर चली आती है 

          प्यासा प्यासा रूप रेत का सूखा परिधान है

         चारों तरफ पसारा जीवन सूखा सब संसार है  

  सूरज शाम को शीतल सुबह सुबह में गुलजार हो जाता 

    तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता


            याचना करता है सृष्टि जल को पुकारे 

            सुने नाही गंगा माता बिरह घेर आते

           दृश्य बताता है जो समझ में आता ना

    क्या है वो वास्तव में जो वास्तविक को दिखता ना 

       धरती का हर वास्तविक रुप भावना से जुड़ा है

        चेतना अनुभूति लेकर करुणा में जिया है

            दया दयावान जल सबको जीलाता है

           जल देकर पाले पोसे माता बन जाता है

    सूरज शाम को शीतल सुबह सुबह में गुलजार हो जाता 

    तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता


          जीवन का कठोर सत्य देख नहीं पाता कोई 

      वास्तव में वास्तविक क्या है सोच नहीं पाता कोई

         सहनशीलता सहने का कैसा कैसा रूप है

         मोहनी है मोह इसका माया का संजोग है

      कठिन परिवेश में इसकी कठिन समय आता है 

       लेके आता समय घटना जीवन को सुनता है

        दर्द सुविधा के बिना धैर्य सब खो जाता है

      मिलती ना शान्ति जब तो आँख भरी आता है

 सूरज शाम को शीतल सुबह सुबह में गुलजार हो जाता 

   तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता


          बाहरी प्रभावों को आसानी से बुलाता है

         होने वाला बोध को आसानी से जगाता है 

         मानसिक प्रभावों को ये जल्दी से बुलाता

          क्रिया प्रतिक्रिया को ये गले से लगाता 

          बात है विरोधी इसकी बड़ा गुणकारी है

          घटन दुर्घटना लाभ का अजीबे सवारी है

          बड़ा है संवेदनशील सोंच को निखारता 

         दुःख सुख लेकर आता प्रेम में है बांधता

 सूरज शाम को शीतल सुबह सुबह में गुलजार हो जाता 

   तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता


            दूसरों की बातें सुनता सुख शान्ति गाता है

          दुःख भय की घृणा में वो अपनो से दुखाता है 

            सबका कल्याण चाहे मंगल सुख बुलाकर 

              आत्मा से बातें करता दिल में समाकर 

          जीवन की अच्छाई सब जीवने से मिलता है

      कोई भजे राजा राम को कोई कृष्ण को पूजता है

          खुशियां देता है सूरज भोरे भोर मुश्का कर

             शाम को सुहाना देता दिन को जलाकर

    सूरज शाम को शीतल सुबह सुबह में गुलजार हो जाता 

      तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता

गीत =} #तपता तीव्र ज्वाला में दोपहर होते ही बेकार हो जाता 

#Tapata Teevr Jvaala Mein Dopahar Hote Hee Bekaar Ho Jaata 

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