शांति की खोज में मन अहंकार और गुरु-चरणों की यात्रा और दुःख से शुद्धि तक असंयमित मन से आत्मबोध की ओर, Shaanti Kee Khoj Mein Man Ahankaar Aur Guru-Charanon Kee Yaatra Aur Duhkh Se Shuddhi Tak Asanyamit Man See Aatmabodh Kee O, Writer ✍️ #Halendra Prasad

शांति की खोज में मन अहंकार और गुरु-चरणों की यात्रा और दुःख से शुद्धि तक असंयमित मन से आत्मबोध की ओर
shaanti Kee Khoj Mein Man Ahankaar Aur Guru-Charanon Kee Yaatra Aur Duhkh Se Shuddhi Tak Asanyamit Man See Aatmabodh Kee Or
             Writer ✍️  #Halendra Prasad 
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मन, दुःख, इच्छाओं, अहंकार, शांति और गुरु-भक्ति पर अत्यंत गहन और मार्मिक आध्यात्मिक चिंतन प्रस्तुत किया है। यह लेख मनोवैज्ञानिक पीड़ा से लेकर आत्मिक शुद्धि तक की पूरी यात्रा को स्पर्श करता है।

घटनाएँ, दुर्घटनाएँ, इच्छाएँ, अहंकार लालसा और शांति का सुख बाहरी दुःख नहीं, बल्कि अंतरात्मा का बोझ है क्योंकि मन पर दुःख इतना हावी है कि हर ओर केवल पीड़ा ही दिखाई देती है।मन की वृत्तियों, इच्छाओं और शोक के चक्र में दरबदर भटकता रहता है!

जितनी इच्छाएँ बढ़ती हैं, उतनी ही शांति दूर जाती है दुःख, रंज, ग़म और वेदना ने मन को जकड़ लिया है इच्छाएँ कामना, मनोकामना, लालसा मनुष्य को अहंकार और स्वाभिमान से दूर ले जाती हैं जिसके कारण मनुष्य शांति का सुख महसूस नहीं कर पाता है!

मनुष्य में इच्छाओं की आग शांति को भस्म कर देती है और जीवन की घटनाएँ मन को व्याकुल कर देती हैं
दुःख इतना गहरा हो जाता है कि सहने वाला पागल-सा हो जाता है क्योंकि अंधकार, आंधी और फितूर  ये सब मानसिक अवस्था के प्रतीक हैं!

कठिन समय मनुष्य की परीक्षा लेता है, परंतु विवेक खोने पर दुःख और बढ़ जाता है क्योंकि मन शांति को हर जगह खोजता है, पर भीतर नहीं झाँकता शोक स्वयं शोक को बुलाता है चिंता मन को डरा देती है और बेचैनया बढ़ा देती है कारण मनुष्य व्याकुल रहता है!

जब तक मन बाहर भटकेगा, तब तक शांति नहीं मिलेगी।
दुःख शांति को छीन लेता है मन विष पीने जैसा व्यवहार करता है
शोक की अग्नि आँखों से आँसू बनकर बहती है और मनुष्य सोचते सोचते दुखित रहने लगता है!

असंयमित मन स्वयं अपना शत्रु बन जाता है और चंचल मन बार-बार पीड़ा को याद करता है दुख का दीप जलाने वाला स्वयं मनुष्य ही है क्योंकि जब मन के मंदिर में धुएँ से भर जाता है, तब खुशियाँ नहीं टिकतीं और मनुष्य उदास रहने लगता है!

शांति का मार्ग बाहर से नहीं आती बल्कि मन की शुद्धि से आती है  दुःख का मूल कारण है असंयमित मन, इच्छाएँ और आसक्ति शांति का मार्ग आत्मचिंतन संयम, वैराग्य और भक्ति
मेरी हृदय मेरी माँ माँ करुणा ममता और आश्रय की प्रतीक है!

इस जीवन में शांति पाने के लिए दुनिया नहीं बल्कि मन बदलना पड़ता है दुःख परिस्थितियों से नहीं बल्कि दृष्टि से पैदा होता है।
मनुष्य की संवेदना आध्यात्मिक चेतना और जीवन के सत्य को उजागर करती है।

मन शांति को बाहर खोजता है, परंतु अपनी ही चंचलता और शोक के कारण उसे पा नहीं पाता  दुःख का कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि असंयमित मन और अंतहीन इच्छाएँ हैं। जब मन शोक, भय और चिंता में डूबा रहता है, तब शांति दूर हो जाती है। सच्ची शांति तभी मिलती है जब व्यक्ति आत्मचिंतन करे, मन को संयमित करे और इच्छाओं से ऊपर उठकर भीतर की शुद्धता और भक्ति को अपनाए शांति बाहर नहीं, अपने मन के भीतर है उसे पाने के लिए मन को दुःख और इच्छाओं के बंधन से मुक्त करना आवश्यक है।

जो मन को दृढ़ बनाने वाला है और अपने हृदय को शान्त रखने वाला है और हर पीड़ाओ को ज्ञान का दीपक बनाकर मार्ग खोजने वाला है अंततः शान्ति उसी को मिलती है पीड़ा पालने वाले को नहीं जहाँ व्यवधान है वहां भी विधि है जहां मौत है वहां श्मशान भी है जहां अच्छाई है वहां बुराई भी है इस सृष्टि में सबकुछ है ढूंढना यह है कि ऐसा क्या है जो नहीं है! किन्तु सबकुछ रहते हुए भी यह निर्भर करता है कि हमें कैसा बनना है और हम कैसा बनना चाहते है पीड़ित या शान्तिमय!

जो मन को दृढ़ बनाता है अपने हृदय को शान्त रखता है और हर पीड़ा को ज्ञान का दीपक बनाकर अपने मार्ग को खोज लेता है।
अन्ततः शान्ति वही पा लेता है पीड़ा को पालने-पोसने वाला नहीं।
जिसने मन को दृढ़ बनाते हुए अपने हृदय को शांति के धागो में पिरो लिया है और हर पीड़ाओं को ज्ञान का दीपक बनाकर
अपने मार्ग को खोज लेया है वो पीड़ाओं को भगाकर शान्ति की द्वार सजाकर सुख शान्ति पा लिया है!

जहाँ व्यवधान है वहीं विधि भी है जहाँ मृत्यु है वहीं श्मशान भी है
जहाँ अच्छाई है वहाँ बुराई भी है यह सृष्टि अपने आप में पूर्ण है।
प्रश्न यह नहीं कि संसार में क्या है प्रश्न यह है कि हम क्या बनना चाहते हैं पीड़ित या शान्तिमय सबकुछ हमारे सामने है पर निर्णय हमारे भीतर है।

 चरण धुली के तले में मस्तक को झुकना शिष्य का अपने गुरु के प्रति विनम्र प्रार्थना है जो पूर्ण समर्पण विनम्रता और आत्म-निष्ठा का प्रतीक है।

चरण-दुली वह अदभुत पवित्रता है जो अहंकार को मिटाकर मनुष्य को शुद्ध कर देती है जो पूर्ण समर्पण विनम्रता और आत्म-निष्ठा का प्रतीक है जहां शिष्य अपने गुरु से चरण धुली के तले में अपने मस्तक को झुकने की आज्ञा मांगता है शिष्य अपने गुरु से विनम्र प्रार्थना कर रहा है कि उसे गुरु के चरणों की धूल तक में अपना सिर झुकाने का अवसर मिले उसे झुकाने की आज्ञा देने की कृपा करे!

सारा अहंकार है मेरा इस जहाँ में शिष्य अपने गुरु के समक्ष यह स्वीकार करता है कि सारा अहंकार है मेरा है इस जहाँ में मैं उसके भीतर अहंकार हूँ और वो मेरे भीतर में है जो संसार की तमाम परिस्थितियों में जन्म लेकर मेरे मन को दूषित कर देता है!क्योंकि स्वीकार करना ही आध्यात्मिक मार्ग पर पहला कदम है और 
अहंकार को पहचानने वाला मनुष्य ही अहंकार को त्याग सकता है।

जब भक्ति भाव और हृदय की शुद्धता से मनुष्य अश्रु धार का आशय लेकर पश्चाताप करता है तो अपने ही आँखों से बहे पवित्र आँसू की धार से अपने को स्नान का प्रतीक बनाकर गुरु की आत्मा को उन आँसुओं में धुलकर पवित्र कर देंता है जो शिष्य को निर्मल कर देता है!

मनुष्य का आँसू कमजोरी नहीं है बल्कि अंतर्मन की शुद्धि तथा अहंकार के विलय का प्रतीक हैं जब शिष्य अपने अहंकार को पहचानकर हृदय की सच्ची विनम्रता के साथ गुरु के चरणों में समर्पित हो जाता है तब गुरु उसकी आत्मा को शुद्ध कर देते हैं।

जब शिष्य अपने अहंकार को पहचानकर हृदय की सच्ची विनम्रता के साथ गुरु के चरणों में समर्पित हो जाता है तब गुरु उसकी आत्मा को शुद्ध कर देते हैं।

गुरु के चरणों में सिर झुकाना मात्र शरीर का झुकना नहीं है
बल्कि अहंकार भ्रम और पीड़ा का झुक जाना है जीवन अकड़न से नहीं चलता अकड़न जीवन को पीड़ा बना देता है जीवन तो प्रेम ज्ञान सद्भावना और वास्तविक जीवन से जीने से चलता है जो
 जो आनन्द मिशाल है जिसे जितना व्याख्या करे उतना ही कम है
दुःख का मूल कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि असंयमित मन और अंतहीन इच्छाएँ हैं इच्छाएँ, अहंकार और लालसा जितनी बढ़ती हैं, शांति उतनी ही दूर होती जाती है मन जब बाहर भटकता है, तब भीतर की शांति दिखाई नहीं देती सच्ची शांति आत्मचिंतन, संयम, वैराग्य और भक्ति से आती है पीड़ा को पालने वाला नहीं, बल्कि पीड़ा को ज्ञान का दीपक बनाने वाला ही अंततः शांति पाता है।

संसार पूर्ण है अच्छाई और बुराई दोनों हैं; प्रश्न यह नहीं कि संसार कैसा है, बल्कि यह है कि हम क्या बनना चाहते हैं।पीड़ित या शांतिमय गुरु के चरणों में मस्तक झुकाना शरीर का नहीं, अहंकार का झुकना है आँसू कमजोरी नहीं, बल्कि अहंकार के विलय और आत्मशुद्धि का प्रतीक हैं जीवन अकड़ से नहीं।बल्कि प्रेम ज्ञान विनम्रता और सद्भाव से चलता है जब जीवन में घटनाएँ दुर्घटनाएँ इच्छाएँ, अहंकार और लालसा बढ़ती हैं, तब शांति का सुख हर दिशा में खोजने पर भी नहीं मिलता क्योंकि मानव मन में व्याप्त दुःख, उदासी, अशांति और मानसिक संघर्ष का अत्यंत मार्मिक चित्रण है जिसे हम समझ नहीं पाते!

टिप्पणियाँ

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