कविता, ||आनन्द की ओर|| Halendra Prasad,
कविता ||आनन्द की ओर||
क्यों क्रोध करते हो कभी कभी मुस्कुराया भी करो
ये आहात अपने को ही करेगा
कभी कभी हँसी को भी गले लगाया करो
क्यों इस धरती पे मरी हुईं लाश की तरह पड़े रहते हो
कभी कभी गिद्ध कौओंको देखकर कुछ सिख जाया करो
इस सोने की बदन को कितना भी कुछ करलो
एक दिन मिटी में मिलजाएगा
नोच नोच कर खा जाएंगे कीड़े
हड्डियां भी नहीं पहचाना जाएगा
ये धरती सबकी माता है एकदिन सबको सुलालेगी
अच्छे बुरे कोई हो सबको पोलहालेगी
कभी कभी धूप में खड़ा हो कर भी
सूरज से गुफ्तगू किया करो
नजरे मिलाकर नजरों से दीदार किया करो
ओ रुकते नहीं चलते रहते है
कभी उनका भी शुक्रिया किया करो
कहा ढूंढने जाओगे चांद सितारे यही आयेंगे
जरा गुरुजी से पूछना वो यही आयेंगे
वो रहते है हरदम साथ में पर दिखते नहीं
आंखे बंद कर के देखन वो पास में ही नजर आएंगे
मल को निकाल दे मन को सफाइयों में ढाल दे
डॉक्टर की जुलाब की तरह सफाइयों से तार दे
आधियों का आवेग छोड़ धीरे धीर शीतलता में आजा
क्रोध को छोड़ आनन्द में आजा
खिला जाएगी चेहरों की रेखाएं
जरा शान्ति को बुला तो ला
दूसरे की सुख ही अपनी सुख है जरा इसे तो बोला
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