आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, कर्म ही गुरु है अवचेतन कर्म और आत्मबोध, Karma Hi Guru Hai Avachetan, Karma aur Atmabodh
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, कर्म ही गुरु है अवचेतन कर्म और आत्मबोध, Karma Hi Guru Hai Avachetan, Karma aur Atmabodh,
मनुष्य का वास्तविक गुरु उसका स्वयं का कर्म है, क्योंकि कर्म ही उसके व्यक्तित्व, विचार, स्वप्न, अवचेतन और जीवन की दिशा को निर्मित करता है। बाहरी संबंध, समाज और अधिकार केवल सहारा दे सकते हैं, परंतु कर्म का फल और उसका उत्तरदायित्व अंततः व्यक्ति को अकेले ही वहन करना पड़ता है। मनुष्य के अनेक निर्णय उसके अवचेतन, संस्कारों, भय, स्मृतियों और आंतरिक द्वंद्वों से प्रभावित होते हैं, फिर भी आत्मबोध के माध्यम से वह सचेत उत्तरदायित्व की ओर बढ़ सकता है। आत्मा और परमात्मा अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के स्वरूप हैं। जन्म-मरण, सुख-दुःख परिवर्तनशील हैं, पर चेतना शाश्वत है और कर्म उसी चेतना की अभिव्यक्ति है। इसलिए कर्म ही गुरु है, आत्मा शिष्य है और जीवन स्वयं एक साधना है, जहाँ सत्य की खोज अंततः भीतर जाकर पूर्ण होती है।
हमारा अवचेतन मन भी हमारे कर्मों से संचालित होता है कर्म ही जीवन का वास्तविक शिक्षक गुरु है आत्मा का आदर्श गुरु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि अपना कर्म ही है क्योंकि मनुष्य की निद्रा अवस्था स्वप्न कल्पना और विचार चिंतन इन तीनों पर कर्म का प्रभाव रहता है।
कर्म का व्यक्तित्व और उसका प्रभाव यह है कि आपने कर्म को सखा मित्र प्रीतम कौशल कला हुनर साहस और आज्ञाकारिता के रूप में चित्रित किया जाना चाहिए क्योंकि कर्म केवल क्रिया नहीं बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व की संपूर्ण अभिव्यक्ति है मनुष्य जैसा कर्म करता है वैसा ही उसका स्वरूप बनता है कर्मों के जीवन में कर्म अपना ही स्वरूप दिखाता कर्म ही मनुष्य का वास्तविक परिचय है।
चाहे अधिकार हों चाहे समाज हो चाहे संबंध हों अंततः कर्म का फल और उसका बोझ व्यक्ति को अकेले ही उठाना पड़ता है क्योंकि मनुष्य का कर्म व्यक्तिगत है उसकी जिम्मेदारी भी व्यक्तिगत है अवचेतन और आंतरिक द्वंद्व कर्म अवचेतन चिंतन में आता है वह हमें संचालित करता है फिर भी वह अकेला रहता है।
मानव जीवन की एक गहरी सच्चाई यह है कि अधिकार समाज परिवार संबंध ये सब मनुष्य को सहारा दे सकते हैं दिशा दे सकते हैं, कभी-कभी उसके कर्मों को प्रभावित भी कर सकते हैं परन्तु अंततः कर्म का फल और उसका नैतिक बोझ व्यक्ति को स्वयं ही वहन करना पड़ता है क्योंकि कर्म सामूहिक परिस्थितियों में जन्म लेकर भी भीतर से व्यक्तिगत होता है निर्णय की अंतिम स्वीकृति मनुष्य के भीतर होती है, और उसी कारण उसका उत्तरदायित्व भी भीतर ही स्थापित होता है।
मनुष्य कई बार सोचता है कि वह स्वतंत्र निर्णय ले रहा है जबकि उसका अवचेतन पहले से उसकी दिशा तय कर रहा होता है। फिर भी उस कर्म का अनुभव पश्चाताप संतोष या पीड़ा अंततः अकेले उसी को महसूस करनी पड़ती है क्योंकि अवचेतन इसी प्रक्रिया का मौन क्षेत्र है बहुत-से कर्म केवल बाहरी इच्छा से नहीं बल्कि दबे हुए भय स्मृतियों संस्कारों अपूर्ण इच्छाओं और आंतरिक द्वंद्वों से संचालित होते हैं।
इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति हमारे दुःख को समझ सकता है पर उसे पूरी तरह जी नहीं सकता अकेलापन मनुष्य की अस्तित्वगत स्थिति भी है और भीड़ में रहते हुए भी भीतर का संघर्ष निजी है।यदि मनुष्य अपने अवचेतन, अपने द्वंद्व और अपने कर्म-प्रेरकों को पहचानने लेगा तो वह केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं रहता, बल्कि सचेत उत्तरदायित्व की ओर बढ़ता है इसलिए आत्मबोध का महत्व बढ़ जाता है।
मनुष्य संबंधों में जीता है पर अपने कर्मों के साथ अंततः अकेला खड़ा होता है अवचेतन उसे दिशा देता है और उत्तरदायित्व उसे स्वयं तक लौटा लाता है। ताकि मनुष्य सत्य को समझ सके!
तर्क उलझन और जीवन की पहेली यह है कि जब विचारों में विरोध होता है तब कर्म के माध्यम से ही सत्य स्पष्ट होता है भ्रम और उलझन तब उत्पन्न होती है जब बुद्धि और चेतना में सामंजस्य नहीं रहता जहाँ बाहरी विविधता के पीछे एक ही तत्व है।
आत्मा और परमात्मा अलग नहीं क्योंकि आत्मा और परमात्मा हर प्राणी के अंदर रहता बाहर से कुछ नहीं आता मूल चेतना भीतर ही है अनुभव की क्षमता उसी से मिलती है और यही वेदांत का सिद्धांत है अहम् ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्म हूँ भीतर वही है बाहर वही है सब ईश्वर का खेल है!
जन्म-मरण, सुख-दुःख सब परिवर्तनशील हैं परन्तु चेतना का तत्व शाश्वत है कर्म उसी चेतना का प्रकट रूप है।यानी कर्म ही गुरु है आत्मा ही शिष्य है और जीवन ही साधना है। जिसे अद्वैत का सन्देश कहते है।
कर्म ही जीवन का मार्गदर्शक है आत्मा और परमात्मा एक ही तत्व हैं बाहरी खोज व्यर्थ है सत्य भीतर है अद्वैत की अनुभूति ही अंतिम शांति है और यही रचना आध्यात्मिक चिंतन, वेदांत दर्शन और आत्म-अनुभूति का सुंदर समन्वय है।
कर्म ही हमारे जीवन का सच्चा गुरु है। वह हमारे निद्रा।स्वप्न और विचारों के शासन में निरंतर कार्य करता रहता है। कर्म हमारे कौशल साहस योग्यता और व्यवहारिक जीवन को दिशा देता है।
कभी वह उलझन और तर्क-वितर्क में डालता है, तो कभी आत्मचिंतन के माध्यम से सत्य का बोध कराता है।
बाहरी सहारों से परे, कर्म और चेतना हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। आत्मा और परमात्मा का तत्व हर प्राणी के अंदर रहता है।जो जन्म-मरण, सुख-दुःख से परे शुद्ध और दिव्य है। क्योंकि अद्वैत और आत्मज्ञान का संदेश देता है कि भीतर और बाहर सब एक
ही चेतना का स्वरूप है।
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