मनुष्य को अपने भीतर झाँककर, अहंकार छोड़कर और ईश्वर से जुड़कर ही जीवन का सही मार्ग और सच्चा आनंद प्राप्त होता है।यह गीत आत्मा मन और जीवन के गहरे सत्य को समझाने वाला एक आध्यात्मिक संदेश है आत्मा एक दर्पण की तरह होती है जिसमें मनुष्य अपने दिल की सच्चाई अच्छाई और बुराई दोनों स्पष्ट रूप से देख सकता है जीवन में चारों ओर शोर, उलझन सुख-दुःख और भटकाव है जिससे इंसान अक्सर भ्रमित हो जाता है। हर व्यक्ति की सोच विचार और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं लेकिन असली पहचान आत्मा से ही होती है। जब मनुष्य अहंकार में आ जाता है तो उसके संस्कार कमजोर हो जाते हैं। माँ ईश्वर को सर्वोच्च शक्ति और शांति का स्रोत है। आत्मा हमें उसी ईश्वर की ओर ले जाती है जहाँ सच्चा सुख और मुक्ति मिलती है। जीवन के अनुभव चाहे अच्छे हों या बुरे हमें सिखाते हैं और मजबूत बनाते हैं। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, अनुभव आत्मा के दर्पण में दिल भी चोर दिखता, #Anubhav Atma Ke Darpan Mein Dil Bhi Chor Dikhta, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
#Anubhav Atma Ke Darpan Mein Dil Bhi Chor Dikhta.
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
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दिखता जीवन का सब शोर उस ओर दिखाता
अनुभव आत्मा के दर्पण में दिल भी चोर दिखता
सीमित होकर चिपक जाता है छोड़ नहीं वो पाता है
सिख लेता है गुणों को परिभाषित करते जाता है
मर्यादित निर्धारित करता निश्चित करके बोले
रूप रेखा वस्तु को देखकर दिल की धड़कन खोले
कौन बताता दिल की बातें किसकी राज धुले है
जीवन को कोई समझ ना पाता जीवन भी उलझे है
घेरलिया जब भगवन ने आत्मा को चारों ओर से
निर्मित किया आकार देकर आत्मा को बड़ी जोर से
दिखता जीवन का सब शोर उस ओर दिखाता
अनुभव आत्मा के दर्पण में दिल भी चोर दिखता
मन मानव का रूप अपना है अपनी अपनी सोच यहां
अपनी है विचार यहां पे अपनी है योजना
चिन्तन मनन की ख्याल अपना है अपनी अपनी जोर यहां
अपना है उद्देश्य इरादा अपनी है धारणा
हर व्यक्ति की अलग विशिष्टता अलग अलग के रूपों में
आत्मिक की पहचान होती है निर्धन और गरीबों में
डर भय की इच्छाओं ने अहंकार को ले कर आया जब
नष्ट किया संस्कारों अपनी रूप दिखाया तब
मेरी आत्मा मुझे बोली तू चल मेरे साथ यहां से
माता के चरणों में जन्नत देख जरा तू दिल से
दिखता जीवन का सब शोर उस ओर दिखाता
अनुभव आत्मा के दर्पण में दिल भी चोर दिखता
जीवन के दुःख सुख में अब तो आशा और निराशा है
प्रेम विरह का ज्ञान अज्ञान है यहीं दुनियां का दासा है
मेरे आत्मा के भीतर में है गीतों का वो जाल बिछा
तरह तरह से शोर मचाकर गूंज गया है दर्द यहां
कितने रूप स्वरूप देखा मैं इस रंग बिरंगी दुनियां में
परम सत्ता का प्यार देखा मैं गौर किया हरमुनिया पे
भावना के संगीत के भीतर कितने अनुभव खड़े मिले
व्यक्ति के व्यक्तित्व है पूर्ण अनुभव में वैभव खिले
उत्कर्ष संपन्नता आई जब ऐश्वर्य खुशहाली लाई
पत्थर पर भी दूब उगाकर उत्तम जीवन बनाई
दिखता जीवन का सब शोर उस ओर दिखाता
अनुभव आत्मा के दर्पण में दिल भी चोर दिखता
हे माता तेरी चेतना से सृजन की कृपा दिखती है
आत्मा में आती है जब तू आत्मा में मुझे दिखती है
गहरे गहरे अनुभव से तू जोड़ देती मुझे अपने से
जीवन का सारा रूप दिखाती आकर मुझको सपनों में
कैसी तेरी रूप है माता कैसी तू दिखती है
आती है हवाओं जैसी पानी बन बरसती है
मन मानसिक में रहती है तू दिखती ना मुझे आँखों से
बन्द करता हूँ आँखो को दिखती है सांसों में
पल पल याद में रहती है जाती ना मुझे छोड़ के
जैसे तन पे कपड़ा रहता रहती है मुझे घेर के
दिखता जीवन का सब शोर उस ओर दिखाता
अनुभव आत्मा के दर्पण में दिल भी चोर दिखता
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